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दंगल एक बारी फिर से

dangal review by getmovieinfo

दंगल एक फिल्म ही नहीं है बल्कि ये एक पिता के सघर्ष भरे सपनो की कहानी है जिसने एक पुरुष-प्रधान देश मे एक ऐसा अधूरा ख्वाब देखा, जो कोई बाप ने सोचा भी ना होगा. महावीर सिंह फ़ोगाट ने एक छोटे से कस्बे मे एक ऐसी उम्मीद को जन्म दिया जिसकी सोच बहुत पहले ही रखी जानी थी. मगर देर आये दुसुत आये. फ़ोगाट का जीवन हरियाणा के भिवानी ज़िले का एक छोटा से कस्बे ‘बलाली’ से शुरू होता है जहाँ वो दुनिया के सबसे बड़े खेल के कुम्ब-मेले मे अपने देश का झंडा सबसे ऊपर देखने का खवाब बुन लेते है. वहां से शुरू होती है दंगल की कुस्ती भरी उम्मीदों की कहानी।

हरियाणा के एक सरल घर मे पैदा हुए महावीर जी जब कुस्ती के अखाड़े मे कदम रखते है तो पहलवानो के बीच तोड़ी चहल कदमी बढ़ जाती है. एक पहलवान होने के नाते महावीर फ़ोगाट को भारत की झोली मे स्वर्ण पदक न जोड़ पाने का दर्द हमेशा सताता रहा और उनको हर पिता की तरह अपने बेटे को आगे करके अपने सपने को पूरा करने की उम्मीद ने बन्दे रखा और अब उसी ख्वाब को पूरा करने के लिए फ़ोगाट अपनी पत्नी से लड़का चाहते हैं। इस कोशिश में फ़ोगाट दंपति को चार लड़कियां हो पैदा हो जाती हैं, जिसका मलाल कुछ हद तक उनकी पत्नी को भी परेशां करता रहता है कहानी जब करवट लेती है जब महावीर फ़ोगाट को लगता है कि अब उनका सपना कभी पूरा नहीं हो पाएगा

वह एक दिन उस उम्मीद को अचानक ही एक बक्स मे बंद कर देते हैं और छोरियां घर के कामो मे माँ के हाथ बढ़ाते हुए बड़ी होने लगती है , इसी बीच कहानी का मज़ेदार किस्सा तब आता है जब एक दिन गांव के कुछ मनचले लड़के गीता और बबीता गांव के छोरो की बुरी तरह पिटाई कर देती हैं और यहीं से महावीर फ़ोगाट का ध्यान अपनी छोरियों के ऊपर जाता है जो छोरियों के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हो जाता है.

महावीर की जिंदगी फिर समाज के सारे कायदे कानून को तोड़ते हुए कुस्ती के अखाड़े मे दस्तक देती है अब वो अपनी छोरियों से उम्मीद बांध कर अपने ख्वाब को पूरा करने की जिद पैदा करते हुए दंगल की तैयारी मे जुट जात्ते है. देखने लायक यहाँ एक पिता का जज़्बा है जब हरियाणा जैसे राज मे खाप पंचायत राज की सरकार गिराने की ताकत रखती है और उसी राज्य का एक पिता अपनी छोरियों को अखाड़े के दंगल मे उतारने के लिए भरपूर मेहनत कर रहा हो, फ़िल्म यहां से रफ़्तार पकड़ लेती है यहाँ फिल्म मे तोडा और सस्पेंस होना चाहिये था. गांव के कुछ लोग उनका मज़ाक उड़ाने से भी चूकते, गीता और बबिता का रहेन और सेहन बेहद देखने लायक है, गीता धीरे धीरे अखाड़े को ही अपना जीवन समझ ने लगती है और राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बलाली का नाम रोशन कर देती हैं।

गीता अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने के लिए बलाली से बाहर पटियाला में ट्रेनिंग लेने जाती हैं। जहां नई तकनीक और हाई फ़ाई पहलवानों के बीच गीता थोड़ी सी हलकी और लक्ष्य से भटकी हुई दिखती है और फिर हारो का सिलसिला ऐसे शुरू होता है।

उधर बबिता भी राज्य स्तर से अब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच जाती हैं और वह भी गीता के साथ ट्रेनिंग के लिए पटियाला पहुंच जाती हैं। यहाँ एक पिता का अभिनय मे आमिर बाज़ी मर ले गए . पिता महावीर फ़ोगाट की फिर फिल्म की कहानी मे जोरदार एंट्री होती जहाँ वो गीता की क़ामयाबी का आने वाला भविष्य लिख जाते है । आख़िरकार वह लम्हा आ जाता है जब महावीर फ़ोगाट की मेहनत रंग लाती है और उनका सपना साकार होता है। गीता 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की ओर से महिला कुश्ती में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला पहलवान बन जाती हैं।

दंगल इसलिए नहीं देखे क्योंकि ये आमिर की फिल्म इसलिए देखे क्योंकि हमारे खिलाडी कैसे अपनी जिंदगी जोख देते है देश के लिए कैसे छोटो कस्बो गांव मे देश से बड़ा कुछ नहीं होता उन कस्बो के लिए आज भी भले सिनेमा घर और शहर दूर हो मगर वहां के होनहार बच्चे कैसे जिंदगी की जदोजदत मे अपनी जिंदगी का मुकाम पा लेते है. कैसे और क्या क्या हमारी सरकारे करती आयी है हमारे खेलो और खिलाड़ियों के साथ कैसे एक पिता के हौसले की मिशाल आज देश दे रहा है सिनेमा घर की खिड़की मे खड़ा होकर.

बाकि रिव्यु खुद करे और फिल्म देखे और बच्चो को भी दिखाए…

About Rohit Dhyani

Observer, Explorer, Senior Correspondent, Writer, Activist, Nature lover, Traveller. A passionate writer, an amateur blogger and a self-proclaimed movie critic. My head rests in the Library and my heart lies in the Movie Theatre.

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