Home / Movies Review / फ़िल्म समीक्षा पी एम नरेंद्र मोदी एक शानदार फ़िल्म

फ़िल्म समीक्षा पी एम नरेंद्र मोदी एक शानदार फ़िल्म


शहज़ाद अहमद
फिल्म पीएम नरेंद्र मोदी एक ऐसे शख्स की गुणगाथा है जिसने बचपन मुफलिसी में गुजारा, जवानी में ही मां का आशीर्वाद लेकर संन्यासी बन गया, गुरु के कहने पर बस्ती में लौटा और अपनी ही पार्टी की अंदरूनी सियासत से जूझकर जननायक बना। बाल नरेंद्र स्टेशन पर चीन सीमा पर जाते फौजियों को जब मुफ्त में चाय पिलाता है, तो ये फिल्म का पहला आधार होता है। फिर वह अपने गुरु को चाकू देते समय इसका दस्ता आगे करता है, तो यह जनहित की दूसरी धुरी बनती है। गुजरात के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में नहरों की खुदाई का जिम्मा लेकर वह बताता है, वोट के पीछे मत भागो, काम करो, वोट खुद चलकर आएगा। वह गुजरात का पहला किंगमेकर है, जिसकी शोहरत से गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक में हलचल है। दर्शन कुमार को फिर उन्होंने फिल्म में ऐसे उत्प्रेरक के तौर पर इस्तेमाल किया है जो मोदी को खत्म करने की साजिश रचने वालों का मोहरा है। अपने चैनल का वह जमकर दुरुपयोग भी करता है। ओमंग ने इस फिल्म को रिश्तों की डोर से बांधा है, ये रिश्ते मोदी-शाह के रिश्तों को जय वीरू और सचिन सहवाग जैसा रिश्ता बताते हैं। ये भी बताते हैं कि बच्चों को विवेकानंद का साहित्य पढ़ने की सीख देने वाले माता-पिता को तब क्या करना चाहिए, जब उनका अपना बच्चा विवेकानंद जैसा बनने की ठान ले।मां इस फिल्म की सबसे मजबूत धुरी है। वह हर उस घड़ी में फिल्म को नया मोड़ देती है जब नरेंद्र मोदी के मन में विचारों का तूफान उठता है। विवेक ओबेरॉय को नरेंद्र मोदी के तौर पर स्वीकार करने में थोड़ा वक्त लगता है। लेकिन, ये बस उतनी ही देर तक है जितनी देर फिल्म गांधी में बेन किंगस्ले को मोहनदास के तौर पर स्वीकारने में लगता है। बस यहां कस्तूरबा नहीं हैं। इसके बाद विवेक ओबेरॉय ने नरेंद्र मोदी के तिलिस्म को परदे पर जीवंत कर दिया है। खासतौर से लाइव इंटरव्यू में मोदी बने विवेक ओबेरॉय की अदाकारी तालियों का हकदार बनती है। मां के रूप में जरीना वहाब, शाह के रूप में मनोज जोशी और टीवी पत्रकार के रूप में दर्शन कुमार ने दमदार काम किया है और फिल्म को मजबूत बनाया है। फिल्म मोदी को चाहने वालों को तो पसंद आएगी ही, उन लोगों को ज्यादा पसंद आएगी जो मोदी को नापसंद करते हैं। चुनाव आयोग की ये दलील भी फिल्म देखने के बाद ठीक ही लगती है कि ये फिल्म मतदाताओं को प्रभावित कर सकती थी। फिल्म सिर्फ बीजेपी समर्थकों को ही नहीं बल्कि एक आम सिने दर्शक को भी प्रभावित करती है। ये एक प्रेरणादायक फिल्म है और दिन में 18 घंटे मेहनत करने वालों का काम के प्रति समर्पण का विश्वास मजबूत करती है। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने इसे अगर ऑस्कर में भारत की प्रतिनिधि फिल्म बनाकर भेजा तो वहां भी ये फिल्म कमाल दिखा सकती है।

कलाकार: विवेक आनंद ओबेरॉय, मनोज जोशी, आदि

निर्देशक: ओमंग कुमार

निर्माता: संदीप सिंह

स्टार 3.0/5

 

 

About Ravi Tondak

I am a fun freak. Love watching movies and specially attached to the movie world. Cinema is close to my heart. This site (www.getmovieinfo.com) is an effort to make Cinema reach far and wide to its audience. I would love to connect with like-minded people and improve your experience at this site.

Check Also

फ़िल्म समीक्षा वन डे जस्टिस डेलिवर्ड

  शहज़ाद अहमद / नई दिल्ली  यह कहानी एक रिटार्यड जज त्यागी (अनुपम खेर) अपने …