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Tribute to Kaifi Azmi on 98th birth anniversary

“फ़नकार का फन जब तक खुद ज़मीन पर उतर कर पसीना ना बहाये , अधूरा रहता है” अधूरे फनकारों के ऐसे मजमे में जो सिर्फ लिखते थे , करते कुछ नहीं थे, भारत में आज के ही दिन एक सम्पूर्ण फनकार का जन्म हुआ “अख्तर हुसैन रिज़वी” जो बाद में “कैफी आज़मी” के नाम से मकबूल हुए.

कैफ़ी का जन्म मिजवां – आजमगढ़ के ज़मीदार परिवार में हुआ. लेकिन सारी शान ओ शौकत छोड़ यह फनकार १९४३ में कानपुर चला आया और मिल मजदूरों की आवाज़ बना. इसके बाद इन्हें बम्बई बुला लिया गया और वहां के मजदूरों के बीच काम करने को कहा गया. वहां कैफ़ी साहब ने अली सरदार जाफ़री के अखबार “कौमी जंग” में नौकरी कर ली. बम्बई में ही १९४७ में कैफ़ी की मुलाक़ात शौकत आज़मी से हुई, जो कैफ़ी के दो बच्चों शबाना और बाबा आज़मी की माँ और थिएटर की एक मशहूर अदाकारा बनीं.

११ साल की उम्र में कैफ़ी ने अपने वालिद को कागज़ का एक पुर्ज़ा दिया के यह ग़ज़ल उन्होंने लिखी है. बाप ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. उसी शाम शहर के एक बड़े मुशायरे उन्हें यह पढने का भी मौक़ा मिल गया. जनता ने उनके हर एक शेर को हाथों हाथ उठा लिया. बाप को यकीन न हुआ इतनी अच्छी ग़ज़ल इस बच्चे ने लिखी होगी. उन्होंने कैफ़ी को एक “तरह” दी यानी शेर का एक मिसरा , के इस पर ग़ज़ल कहो. कैफ़ी ने इस पर भी शानदार ग़ज़ल लिख दी तब पिता को बेटे के टैलेंट का पता चला.

आइये पढ़ते हैं उस ११ साल के बच्चे की कही हुई यादगार ग़ज़ल….

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की खलल पड़े
हंसने से हो सुकूँ, न रोने से कल पड़े

जिस तरह हंस रहा हूँ, मैं पी पी के अश्क-ए-गम
यूं दूसरा हँसे, तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम, के तुमको फिक्र-ए- नशेब -ओ-फ़राज़ है
एक हम, के चल पड़ें, तो बहरहाल चल पड़ें

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी खुश तो हो गया, मगर आंसू निकल पड़े

साकी सभी को है, ग़म-ए-तशनालबी मगर
मय है उसी के नाम पे, जिस के उबल पड़े – अख्तर हुसैन रिज़वी ( कैफ़ी आज़मी की पहली ग़ज़ल)
हैदर रिज़वी की फेसबुक वाल से.

About Rohit Dhyani

Observer, Explorer, Senior Correspondent, Writer, Activist, Nature lover, Traveller. A passionate writer, an amateur blogger and a self-proclaimed movie critic. My head rests in the Library and my heart lies in the Movie Theatre.

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